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विवाह की वैभवशाली परंपरा


 क्या है विवाह?
सात्विक परम्पराओं का उपहार है विवाह, दो गोत्रों-परिवारों का त्यौहार है विवाह ।
वैदिक-धार्मिक-पुनित संस्कार है विवाह, गृहस्थ जीवन का प्रवेशद्वार है विवाह । ।
दो आत्माओं के मिला का आधार है विवाह, प्रेम-विश्वास-समर्पण का संसार है विवाह ।
भावनाओं और सपनों का श्रृंगार है विवाह, दंपत्ति सम्बन्धन का मुनहार है विवाह । ।

छत्तीसगढ़ की परंपराओं में विवाह का अपना विशिष्ट स्थान है। विवाह जीवन के 16 संस्कारों में एक महत्वपूर्ण संस्कार है। इस संस्कार में निहित है कई रस्मों-रिवाज। आखिर क्यों करते हैं हम रस्म? क्या है इसकी महत्ता? इन सबके उत्तर छुपे हैं वैवाहिक संस्कार के पृष्ठों में। रस्मों के दर्शन और उद्देश्य बताने का प्रयास है वैवाहिक संस्कार का यह छोटा सा झलक -

मंगनी (सगाई)
सगा शब्द का विस्तार है सगाई - आत्मीयता और घनिष्टता का संगम। दो परिवारों के सगा बनने अर्थात रिश्तेदार बनने का संस्कार है सगाई। इसे मंगनी भी कहते हैं। यह विवाह की प्रथम सीढी है। चूंकि इसमें दो परिवार नये रिश्ते जोड़ने के लिए वचनबद्ध होते हैं इसलिए इस रस्म को 'वाग्दान' भी  कहते हैं। इस रस्म में कन्या का हाथ मांगने वर पक्ष का मुखिया वस्त्र, आभूषण व कलेवा लेकर जाता है। इस अवसर पर अंगूठी पहनाने एवं भेंट देने की परंपरा भी प्रचलित है। हर्षोल्लास के बीच दो परिवारों के परिचय के साथ दो इंसानों के हमसफर बनने की शुरूआत है - सगाई।

मड़वा (मंडपाच्छादन)
हरीतिमा का प्रतीक है मड़वा। इसे हरियर मड़वा भी कहते हैं।इसकी शीतल छांव में रिश्तों की दूरियां समाप्त हो जाती है। डूमर, चिरई जाम (जामुन), आम या महुआ की हरी-भरी डालियों से मड़वा का आच्छादन किया जाता है, जो उमंग, उल्लास व उत्साह का प्रतीक है। सबसे पहले घर के बड़े-बुजुर्ग पूजा घर में कलशा स्थापित कर कुल देवी-देवता के सामने दीप प्रज्वलित करते हैं। नारियल रखकर, हूम देकर, साड़ी-धोती एवं सुहाग का सामान रखते हैं। पश्‍चात शक्ति पूजा, नवग्रह पूजा, पृथ्वी व पितरों की पूजा एवं आव्हानकर मड़वा के लिए गड्ढा खोदा जाता है। एक मड़वा में दो बांस को ढेड़हा के साथ 7 हाथ मिलाकर गड़ाते हैं। इसप्रकार मंडप में दो मड़वा गड़ाये जाते हैं। इस मड़वा के तले विवाह के सभी रस्म सम्पन्न होते हैं।

चुलमाटी
मंडपाच्छादन के बाद दामाद या फूफा के साथ वर-वधू की माँ, चाची या बड़ी माँ देवस्थल या गांव के उस स्थल से 7 टोकरी में मिट्टी लाते हैं जहां कोई फसल न उगी हो अर्थात - कुंवारी मिट्टी। पूजा-पाठ करके मिट्टी खुदाई का कार्य दामाद या फूफा करते हैं। माँ, चाची या बड़ी माँ उस मिट्टी को अपने आंचल में लेती हैं और सम्मान पूर्वक बाजे-गाजे के साथ उस मिट्टी को घर लाकर उससे चूल्हा निर्मित करते हैं। इस नेंग का आशय है कि देव स्थल की मिट्टी से निर्मित चूल्हे का भोजन, पकवान आशीष से भरा हो।

तेलमाटी
यह भी चुलमाटी की तरह देवस्थल या गांव में निर्धारित स्थल से लाया जाता है। इस मिट्टी को मड़वा के नीचे रखा जाता है। जिसके ऊपर मड़वा बांस व मंगरोहन स्थापित होता है। इस रस्म के पीछे मड़वा स्थल पर देवताओं के वास का भाव है।

मंगरोहन
मंगरोहन शब्द मंगल + आरोहन से बना है। इसमें डूमर या चार की लकड़ी को पूजा करके लाया जाता है। तथा बैगा या बढ़ई के घर मंगरोहन का स्वरूप देने के लिए भेजा जाता है। निर्माण पश्‍चात बाजे-गाजे के साथ बैगा या बढ़ई के घर से मंगरोहन को परघाकर मड़वा स्थल तक लाया जाता है। यहां छिंद की पत्ती का तेलमौरी बनाकर उसमें बांधते हैं तथा मड़वा के तले स्थापित करते हैं। सर्वप्रथम दुल्हा-दुल्हन की शादी मंगरोहन के साथ होती है ताकि किसी प्रकार का अनिष्ठ न हो। मंगरोहन मूलतः मंगल काष्ठ है।

मायन (मातृकापूजन)
इस रस्म में सप्त मातृकाओं की पूजा होती है। यथा गोमातृका, तृणमातृका, मृयमातृका, तुंगमातृका, जलमातृका, तोरणमातृका एवं मंडपमातृका इन सप्त मातृकाओं की विवाह में अहम भूमिका होती है। इसी दिन देवतेला का नेंग होता है। जिसमें देवी-देवताओं को तेल-हल्दी चढ़ाते हैं और शेष तेल-हल्दी को वर-वधू को चढ़ाते हैं ताकि विवाह निर्विध्न संपादित हो। संध्या काल हरदाही खेलते हैं। जिसमें चिकट का नेंग होता है। मामा पक्ष से वस्त्र, उपहार आदि वर-वधू के माता-पिता के लिए आता है, इसे भेंटकर हल्दी लगाते हैं। जिसका आशय आपस में मधुरता बढ़ाने से है। इसी समय रिश्तेदारों का आपस में परिचय भी होता है।

नहडोरी
नहडोरी अर्थात स्नान। वर-वधू के लेपित हल्दी को धुलाने का कार्यक्रम है नहडोरी। रस्म अनुसार वर-वधू को स्नान कराया जाता है ताकि बारात व भांवर के लिए वर-वधू को सजाया-संवारा जा सके। नहडोरी के बाद मौली धागा को घुमाकर वर-वधू के हाथों में आम पत्ता के साथ बांधते हैं। इसी को कंकन कहते हैं।

मौर सौंपना
मौर का अर्थ होता है मुकुट राजा-महाराजाओं कका श्रृंगार तथा जिम्मेदारी का प्रतीक। मौर धारण कर दुल्हा, राजा बन जाता है इसलिए इन्हें दुल्हा राजा भी कहते हैं। मौर सौंपने का आशय वर को भावी जीवन के लिए आशीष व उत्तरदायित्व प्रदान करना है। इस रस्म में बारात प्रस्थान के पूर्व वर को पूजा घर में वस्त्रादि से सजाकर सुवासा मौर बांधता है। आंगन में चौक पूरकर पीढा रखते हैं, वर को उस पर खड़ाकर या कुर्सी में बिठाकर सर्वप्रथम माँ पश्चात काकी, मामी, बड़ी बहनें व सुवासिन सहित 7 महिलाएं मौर सौंपती है।

बारात
बारात अर्थात वर यात्रा। वर पक्ष का वधू के घर विवाह हेतु जाने का रस्म है बारात। दुल्हे के रिश्तेदारों के साथ-साथ मित्र व गांव के लोग इस यात्रा के यात्री होते हैं, इन्हें बाराती कहते हैं। बाराती मूलतः विवाह के साक्षी होते हैं, जिनके समक्ष वर-वधू का पाणिग्रहण व फेरा होता है। बारातियों का वधू पक्ष की ओर से जोर शोर से स्वागत किया जाता है। दोनों पक्ष के समधियों का मिलन होता है जिसे समधी भेंट कहते हैं।

पाणिग्रहण
पाणि + ग्रहण अर्थात हाथ स्वीकार करना। इस रस्म में वधू के पिता वर के हाथ में वधू का हाथ रखकर तथा उसमें आटे का लोई रखकर धागे से बांधते हैं। तत्पश्‍चात वर तथा वधू के पैर के अंगूठों को दूध से धोकर माथे पर चांवल टिकते हैं। यह विवाह का महत्वपूर्ण रस्म जिसमें वर द्वारा वधू को ताउम्र जिम्मेदारी निभाने तथा वधू का समर्पण का भाव निहित है।

भांवर (फेरा)
भांवर महज परिक्रमा नहीं है, हर भांवर के साथ वधू को अपने बचपन के आंगन से बिछुड़ने का अहसास होता है और प्रत्येक भांवर अनजाने से नाता जुड़ने का बोध कराता है। इस रस्म में मड़वा के बीच रखी सील पर चांवल की 7 कुढ़ी के साथ हल्दी, सिंघोलिया व सुपाड़ी रखते हैं। वधू आगे व वर पीछे रहते हुए सील की परिक्रमा करते हैं। प्रत्येक परिक्रमा के बाद वर, वधू के पैर का अंगूठा पकड़कर 1 कुढ़ी गिराता है। लड़की का भाई लड़की की हथेली में लाई डालता है, लड़की इसे गिराती है। इस प्रकार 6 भांवर सील के चारों ओर और सातवां भांवर मड़वा के चारों ओर दोनों घूमते हैं। इस रस्म में प्रयुक्त सील यज्ञ भगवान का तथा लाई पतिव्रता का प्रतीक है।

मांग भरना
सिंदूर सुहाग का प्रतीक है। मांग भरने के बाद वधू सुहागिन हो जाती है तथा पतिव्रता धर्म पालन के लिए प्रतिबद्ध हो जाती है। इस रस्म में वर द्वारा वधू के मांग में 7 बार बंदन या सिंदूर लगाया जाता है। तत्पश्‍चात पण्डित द्वारा साखोचार होता है। वामांग में आने के पूर्व वधू वर से सात वचन मांगती है, जिस पर ध्रुव-तारे, अग्नि, बाराती तथा घराती को साक्षी मानकर वर, वधू को सात वचन देता है -

सात वचन
1. तीर्थ, व्रत, उद्यापन, यज्ञ, दान आदि सभी कार्य मेरे साथ करने का वचन डो तो मैं तुम्हारे वाम अंग में आउंगी अर्थात पत्‍नी बनूंगी।
2. यदि तुम हविष्यान्न देकर देवताओं की और हव्य देकर पितरों की पूजा करोगे तो मैं तुम्हारे वाम अंग में आउंगी।
3. यदि तुम परिवार की रक्षा और पशुओं का पालन करोगे तो मैं तुम्हारे वाम अंग में आउंगी।
4. यदि तुम आय-व्यय और धान्य को भरकर गृहस्थी को संभालो तो मैं तुम्हारे वाम अंग में आउंगी।
5. यदि तुम देवालय, बाग, कूप, बावड़ी आदि बनाकर पूजा करो तो मैं तुम्हारे वाम अंग में आउंगी।
6. यदि तुम अपने नगर में अथवा किसी और शहर में जाकर वाणिज्य व्यवसाय करो तो मैं तुम्हारे वाम अंग में आउंगी।
7. यदि तुम किसी पराई स्त्री को स्पर्श न करो तो मैं तुम्हारे वाम अंग में आउंगी।

बिदाई
बाबुल यानी पिता के घर से अपने घर की ओर जाती है वधू, बिदाई देते हैं सभी प्रियजन। बचपन की सखियाँ, पिता का दुलार, माँ की गोद, भाई के स्नेह, बहनों के प्यार से बने घर-आंगन को छोड़कर कन्या अब अपने नये घर की ओर चलती है। भीगी आँखों से अपनी लाडली को बिदा करते स्वजनों की ओर देखते अपरिचित की आँखे भी छलक जाती है। हाथ में धान भरकर पीछे की ओर उछालती बेटी मायके की कामना करती है। बिदाई है नवसृजन के लिए पुनर्जन्म।

डोला परछन
जब डोला घर के दरवाजे पर रुकता है तब माँ डोली के ऊपर सूपा रखकर पांच मुट्ठी नमक रखती है। ऊपर से मसूर को इस पार से उस पार करती है। यह एक प्रकार का टोटका होता है। इसके बाद मायके के झेंझरी में जिस पर धान भरा होता है, बहू को उस पर पैर रखकर उतारा जाता है। अंदर जाकर बधू मायके के चांवल को 7 डिब्बा भरती है उसे हर बार वर पैरों की ठोकर से गिरा देता है। चांवल भरने के ढंग से वधू की कार्यकुशलता का अंदाज लगाते हैं। डोला परछन का आशय वधू का नये घर में स्वागत और लक्ष्मी का अभिनन्दन है।

कंकन-मउर/धरमटीका
यह रस्म मूलतः वर-वधू के संकोच को दूर करने का उपक्रम है। इसमें कन्या के घर से लाये लोचन पानी को एक परात में रखकर दुल्हा-दुल्हन का मड़वा के पास एक दूसरे का कंकन छुड़वाया जाता है। फिर लोचन पानी में कौड़ी, सिक्का, मुंदरी, माला खेलाते हैं। जिसमें वर एक हाथ से तथा वधू दोनों हाथ से सिक्का को ढूंढते हैं। जो सिक्का पाता है वह जीत जाता है। यह नेंग 7 बार किया जाता है। इसके बाद सभी टिकावन टिकते हैं जिसे धरमटीका कहते हैं।

बाजा (वाद्य)
वैवाहिक संस्कार में वाद्ययंत्र का प्रमुख स्थान है। वाद्ययंत्र प्रत्येक रस्म के भाव को प्रदर्शित करते हैं। जहां एक ओर निसान नाचने के लिए विवश करता है वहीं दूसरी ओर मोहरी विभोर कर देता है। दफडा, टिमऊ और झुमका विवाह संगीत को और समृद्ध कर देते हैं।

साभार - चंद्रभूमि अंक 2,  दाउलाल चन्द्राकर, महासमुंद, मोबाईल नं. 9926162300

छत्तीसगढ़ी व्यंजन - खाइ खजेना

छत्तीसगढ़ में खान-पान की विशिष्ट और दुर्लभ परंपराएं है। आदिवासी समाज में प्रचलित 'वनोपज' से लेकर जनपदीय संस्कृति तक 'कलेवा' अपना रुप बदलता है। पारंपरिक व्यंजन सिर्फ उत्सव-त्यौहार में स्वाद बदलने का जरिया मात्र नही, वे हमें हमारी विरासत से भी परिचित कराते है। समय के साथ 'स्वाद का सहज संसार' भी बदलता गया है। आधुनिक होते परिवेश में नई पीढ़ी को अपने सांस्कृतिक मूल्यों से परिचय कराना हमारे बस में है।

छत्तीसगढ़ के जनसाधारण का व्यवसाय कृषि है। अनेक प्रकार के उत्कृष्ठ प्रजाति के धान छत्तीसगढ़ के "धान के कटोरा" नाम को सार्थक करते हैं। यद्यपि गेंहूं, दाले व तिलहनों का भी उत्पादन होता है, तथापि मुख्य उपज धान ही है। यहाँ के लोगों का मुख्य भोजन चावल है, यद्यपि चावल की अपेक्षा सस्ता होने के कारण आजकल गेंहूं भी यहां के निवासियों के भोजन का हिस्सा बन गया है। सामान्यतः दोनो समय भात मिले तो कई प्रकार के शाक यहाँ के लोगों का मुख्य भोजन है। नदी-तालाबों में पाई जाने वाली मछलियाँ भी शौक से खाई जाती है। पहले रात के समय के बचे भात में पानी डालकर, सबेरे बासी खाने का रिवाज है। खमनीकरण के कारण बासी में ऐसे तत्वों का समावेश होता है, जिससे लोग बहुत काम कर सकते थे, पर अब बासी खाने का रिवाज धीरे-धीरे चाय ने ले लिया है।

छत्तीसगढ़ स्वाद के मामले मे बेजोड़ है। यहाँ मागंलिक अथवा गैर मांगलिक दोनों अवसरों पर घरों में एक से एक व्यंजनों का चलन है। नमकीन, मीठे, व्यंजनों की इन श्रृंखला में भुने हुए, भाप में पकाए और तले प्रकार तो है, और इनसे अलग हटकर भी व्यंजन बनाने की रिवाज है। इन खाद्य पदार्थो में उन्ही वस्तुओं का इस्तेमाल होता है जिनकी जरुरत रोजमर्रा की रसोई में हम किया करते है। जैसे आटा, ज्वार, चना, तिल, जौ, चावल, चोकर, गुड़, गोंद आदि। ये मिठाईयाँ न तो किसी सांचे से ढ़लती है और न ओवन के गणितीय तापमान से इनका नाता है। चकमकी और रंगीन आभा वाली बाजारु मिठाईयाँ के सामने ये मिठाईयाँ खासी विनम्र और सादगी युक्त तो है, पौष्टिकता के मुकाबले मे भी इनका जवाब नही।

यूं तो हर प्रदेश में अपने उत्पादन के अनुसार अलग-अलग पकवान बनते हैं। छत्तीसगढ़ के अधिकांश पकवानों में चांवल का प्रयोग होता है। धुंसका-अंगाकर, चीला-चौंतेला, फरा-अइरसा, देहरौरी केवल चांवल के ही बनते हैं। खुरमीं-पपची में गेहूं एवं चावल के आटे का उपयोग होता है। ठेठरी, करी, बूंदी, बेसन से बनते हैं। भोजों में बरा-सोंहारी (पूरी), तसमई (खीर) बनाई जाती है। छत्तीसगढ़ में महिलाओं के तीन प्रमुख व्रत हैं - तीजा, बेवहा, जूंतिया और भाई-जूंतिया। इन व्रतों में चीला-बिनसा का फरहार बनता है, जिसको सबको खिलाया जाता है।  कुछ विशिष्ट अवसरों पर विशेष तरह के व्यंजन बनते हैं। शादी में छींट के लड्डू अवश्य बनते हैं, इसमें पैसे आदि भरकर बेटी के ससुराल विशेष तौर पर भेजे जाते हैं। हरेली में बबरा चीला बनता है। तो राखी तीजा में ठेठरी खुरमी, पोला में मीठा खुरमा के आटे की गोली तलकर बैल की पूजा होती है। होली में अईरसा कुसली बनती है।

नया चावल आने पर चौन्सेला, चीला, फरा का आनंद लिया जाता है। नया गुड आने पर कतरा पकुआ, दहरौरी बनाते है। सावन में दूध का फरा बनता है। भादो में ईढर - जिसे हिंदी में अरबी और छत्तीसगढ़ में कोचई कहा जाता है इसके नए पत्तों से ईढर बनाकर खाने में मजा आता है। बरा (बड़ा) तो सभी के सुख दुःख का साथी है। शादी में भी बरा और मृत्यु भोज में भी बरा। पितृ पक्ष में तो पन्द्रह दिन प्रत्येक घर में बरा बनाया जाता है, कौवों को खिलाया जाता है और खुद भी खाया जाता है। इस तरह हमारे छत्तीसगढ़ में सभी त्योहारों और ऋतुओं के हिसाब से व्यजन बनाकर खाया जाता है और खिलाया जाता है।

आइए नजर डालें छत्तीसगढ़ी स्वाद की इस झांपी में जहां फरा, पीठिया, छिटहा लाडू, मुठिया, चौंसेला, अइरसा, देहरौरी, चीला, सोंहारी, पपची, ठेठरी, खुरमी सहित और भी बहुत कुछ गुण-ग्राहकों की प्रतीक्षा में है। ममत्व और श्रम सींच-सींच कर बनाई गई इन घरेलू मिठाईयों का एक मर्तबा स्वाद लीजिए। ।

चीला
यह तीन प्रकार से बनाया जाता है - सादा चीला, नूनहा चीला(नमकीन) तथा गुरहा चीला(मीठा)। चीला बनाने के लिए चावल रात में भिगाया जाता है। सबेरे पानी निकालकर छाया में सुखाते हैं। फिर ढ़ेकी में पीसकर आटा बनाया जाता है, जिसे सांट कहते हैं। सांट में पानी डालकर घोल बनाते हैं। घोल जितना पतला रहता है, चीला भी उसी अनुपात में पतला होता है। बड़े-मोटे तवे को चूल्हे में रखकर गर्म करते हैं। कपड़ा या रूई को तेल में डुबा कर तवे में घुमाते हैं। तेल लगे तवे के सांट के घोल को कलछी से पतला फैलाते हैं। फिर उसे ढंक देते हैं। कुछ देर बाद ढक्कन निकाल चीला को पलटकर सेंकते हैं। दोनों तरफ सिक जाने पर चीला को थाली में उतार दूसरा चीला ढाला जाता है। चावल के आटे में नमक डालने से नुनहा चीला बनता है एवं घोल में गुड़ डाल देने से गुरहा चीला। इन दोनों चीले का स्वाद हरी मिर्च और पताल की चटनी से बढ़ जाता है ।

चौंसला
गर्म पानी में सांट को गूंथते हैं। कभी नमक डाल दिया जाता है, तो कभी बिना नमक के ही गूंथ कर छोटी-छोटी लोई बनाते है। हथेली में तेल लगाकर लोई को फैलाया जाता है। आकार में पूरी से छोटी किन्तु कुछ मोटी होती है। फिर गर्म तेल में छानते हैं। छोटे आकार के कारण एक साथ कई चौंसले छन जाते हैं। इसे पूरी का पूरक कहा जा सकता है। हरेली, पोरा, छेरछेरा आदि में विशेष रूप से बनता है। इसे गुड़ या अचार के साथ खाते हैं।

फरा
फरा दो प्रकार से बनाते हैं। गाँव में जब गन्ने की पेरोई होती है, तब ताजे रस को गर्म करने के लिए रखा जाता है। चावल के आटे को गरम पानी से गूंथकर हथेलियों से पतली बाती के समान बनाकर रखते हैं। उबलते रस में फरा को डालकर पकाते हैं। पक जाना पर इलायची डालते हैं। गन्ने का रस ना रहने पर गुड़ के घोल से भी फरा बनाते हैं। खाने में यह स्वादिष्ठ होता है। नूनहा फरा बनाते समय आटा में नमक डालकर गुंथते हैं। फिर हथेली से छोटी लोइ को बर कर फरा बना कर रखते हैं। भगोने में पानी उबालने रखते हैं। उस पर चलनी रखते हैं। उबलने पर चलनी में फरा रखकर ढ़ंक देते हैं। दस मिनट बाद फरा भाप में पक जाता है। एक कड़ाही में तेल डाल कर सरसों और मिर्च का बघार लगाकर फरा पर डाल दिया जाता है। अब फरा के खाने के लिए तैयार है।

अइरसा
छत्तीसगढ़ी पकवानों में सबसे स्वादिष्ठ तथा बनाने में सबसे कठिन है। गुड़ की चासनी बनाते हैं। इसे गरम-गरम ही सांठ में डालकर गूंथते हैं। मुलायम होने पर छोटी-छोटी लोई तोड़कर हथेलियों में फैलाते हैं। छोटी पूरी के आकार का होने पर तिल पर रखते हैं, जिससे एक तरफ तिल चिपक जाता है। फिर उसे तेल में तलते हैं। यद्यपि गुड़ की चासनी का सही पाग बनाना कठिन है, और गर्म चासनी में गूंथना भी काफी कठिन है, पर बनने पर यह बेहद स्वादिष्ठ होता है।

अइरसा एक लोकप्रिय छत्तीसगढ़ी व्यंजन है। इस मीठे व्यंजन को बनाने की विधि अत्यंत सरल है। पहले चावल को रातभर (सामान्यतः छह-सात घंटे ठीक इडली की तरह) भींगा कर रखा जाता है, फिर पानी को निकालकर पीस लिया जाता है, अब इसमें गुड़ अच्छी तरह से मिला कर इसे बड़े के आकार का बना तेल में तल लिया जाता है। इसे ऐसे ही खाया जाता है। सावधानीः भजिया की तरह इसे फुलाने की लिए खाने का सोडा इस्तेमाल न करें अन्यथा बड़े के आकार का यह व्यंजन बूंदी के समान बन जाएगा।

देहरौरी
यह नायाब छत्तीसगढ़ी पकवान है, जिसे बनाने में दक्षता अपेक्षित है। दरदरे चावल से बनी देहरौरी अपनी अलग पहचान रखती है। चासनी में भींगी देहरौरी को रसगुल्ले का देसी रुप कह सकते हैं।  इसके लिए चावल को भिगाकर छाया में सुखाया जाता है। फिर ढ़ेकी में या जाता में इसे दरदरा पीसा जाता है,जिसे दर्रा कहते है। दर्रा में घी का मोयन डालकर दही में गूंथते हैं। छोटी लोई तोड़कर हथेलियों में रखते हैं तथा इसे बरा के समान बनाकर तेल में तलते हैं। अब शक्कर या गुड़ की दो तार की चासनी बनाकर देहरौरी को चासनी में डुबाते हैं। दूसरे दिन तक देहरौरी में रस अच्छी तरह भिद जाता है। गुड़ का देहरौरी अधिक स्वादिष्ठ होता है।

खुरमी
गेहूं तथा चावल के आटे के मिश्रण से निर्मित मीठी प्रकृति का लोकप्रिय व्यंजन है। गुड़ चिरौंजी और नारियल इसका स्वाद बढ़ा देते हैं। तीन भाग गेंहूं आटा तथा एक भाग चावलों के मोटे पिसे आटे के मिश्रण में घी का मोयन किया जाता है। गुड़ का गाढ़ा घोल बनाते हैं। आटा में चिरौंजी, सूखे नारियटल के टुकड़े एवं मूंगफली दाना डालकर कड़ा गूंथते हैं। छोटी लोई बनाकर हाथ की मुठ्ठियों में दबाते हैं। कई लोग लोई को टोकनी से भी दबाते हैं। फिर इन्हें गर्म किए हुए तेल में मंद आंच से पकाते हैं। अच्छी तरह पक जाने पर कड़ाही से निकलते हैं, इस तरह खुरनी तैयार हो जाती है। आज कल तो शक्कर या गुड़ में गुथे आटा को बेल कर चौकोन काटकर तल लेते हैं।

पपची
पपची बनाने में दक्षता की आवश्यकता होती है। तीन भाग गेहूं में एक भाग चावल के आटे के मिश्रण में घी का मोयन डालकर खूब कड़ा आटा गूंथा जाता है। छोटी-छोटी लोई बना पटे से दबा कर गोल, चपटा आकार दिया जाता है। तेल को गर्म कर कुछ ठंडा करते हैं। इसमें पपचियाँ डालकर मंद आंच में तलते हैं। गुड़ या शक्कर की दो तार की चाशनी बनाते हैं। चाशनी को झारे से फेंटकर पपची लपेटकर अलग करते हैं। कुछ देर में चाशनी सूख जाती है। अधिक मोयन और मंद आंच में पकने के कारण यह कुरमुरा और स्वादिष्ठ होता है। शक्कर की अपेक्षा गुड़ से पागने पर अधिक स्वाद आता है। शादी-ब्याह, गवन-पठौनी में बहुत बड़ी पपचियाँ बनतीं हैं।

कुसली
गुझिया ही छत्तीसगढ़ी में कुसली कहलाता है। आटा या मैदा में मोयन डालकर गूंथते हैं। खोया को भूनते हैं। उसमें थोड़ी भुनी हुई सूजी, किसा हुआ नारियल, चिरौंजी और पिसी शक्कर मिलाते हैं। खोया ना मिलने पर कई लोग आटा को भूनकर उसी का भरावन बनाते हैं। बीच में भरावन रखकर दोनों ओर से चिपकाकर कटर से काट लेते हैं। पहले तो हाथ से ही बहुत सुंदर गुजिया बनाई जाती थी। अब तो गुझिया मेकर आ गया है। फिर घी या तेल से तलते हैं। इस प्रकार स्वादिष्ठ कुसली तैयार हो जाती है।

बरा
हिन्दी में इसे बड़ा कहते हैं, जो कि उड़द दाल से बनता है। इसके लिए छिलके वासी उड़द दाल के भिगा कर धोते हैं। फिर छिलका निकालकर पीसते हैं। नमक, हरी मिर्च, कटा अदरक डालकर पीढ़ी फेंटते हैं। फिर इसकी लोई बनाकर हथेली में गोल बनाकर तेल में तलते हैं। शादी-ब्याह तथा पितर में बड़े अवश्य बनते हैं। बरा को गर्म पानी में डालकर निकालते हैं, फिर दही में डालकर दहीबड़ा बनाते हैं।

बबरा
गुड़ को पानी में घोलकर गाढ़ा घोल बनाते हैं। इसमें चावल या गेहूं के आटा को घोलकर चम्मच से गरम तेल में डालते हैं। दोनों तरफ से तल कर निकाल लाता हैं। मातृ नवमी के दिन बबरा अवश्य बनाया जाता है।

बिनसा
बहुत कुछ पनीर की तरह ही बनता है। दूध को चूल्हे में गर्म करता हैं। उबाल आने पर खट्टा दही डालते हैं, जिससे दूध फट जाता है। अब स्वादानुसार गुड़ या शक्कर डालकर कुछ देर तक पकने देते हैं। इस प्रकार बना बिनसा चीला या पूरी के साथ खाया जाता है।

ठेठरी
बेसन में स्वादानुसार नमक और आजवाइन डालकर तेल का मोयन देते हैं। पानी से बेसन को गूंथकर छोटी लोई बनाकर पटे में रखते हैं और हथेली से घुमाकर बत्ती के समान बनाते हैं। फिर इसे इच्छानुसार गोल या लंबी आकृति में बना कर तेल में पकाते व छानते हैं।

करी

यह बेसन का मोटा सेव है। नमक डालकर नमकीन करी बनाते हैं, तथा बिना नमक के करी से लड्डू बनाते हैं। दुःख-सुख के अवसरों में करी का गुरहा लड्डू बनाया जाता है ।

बूंदी
बेसन को फेटकर पतला घोल बनाकर झोर से बूंदी छानते हैं। बूंदी को शक्कर में पाग कर खाते हैं। इसका लड्डू भी बनाते हैं। रायता और कड़ी के लिए भी बूंदी बनाई जाती है।

तसमई
खीर को छत्तीसगढ़ी में तसमई कहते हैं। इसके लिए दूध में चावल डालकर पकाते हैं। दूध के गाढ़ा होने तक चावल पक जाता है तथा इसमें शक्कर डालकर फिर पकाते हैं। पक जाने पर पिसी इलायची, किशमिश, काजू तथा नारियल डालते हैं। हर भोज में तसमई अवश्य परोसा जाता है।

भजिया
उड़द की पीठी या बेसन दोनों से भजिया बनाने का रिवाज है। पत्तल में परोसने का यह आवश्यक आहार है।

शादी-ब्याह के अवसर पर लगने वाली सामग्रीयां

शादी में तेलमाटी, चुलमाटी, मंगरोहन, दौतेला, मायन और चिकट में लड़का और लड़की दोनों के लिए एक ही तरह के सामान की जरूरत होती है।

सगाई :  
लड़के वालों के लिए  (11 व्यक्ति)
     1. साड़ी, पेटीकोट, ब्लाउज लड़की के लिए
     2. श्रृंगार का सामान
     3. अंगूठी या रुपया
     4. मिठाई, फल, मेवा  आदि
        (रुपया जरूरी बाकि सभी ऐच्छिक)

लड़की वालों के लिए
     1. कपड़ा लड़के के लिए
     2. अंगूठी लड़के के लिए
     3. धोती समधी के लिए
     4. नारियल अन्य मेहमानों के लिए

लगन :
     1. दोनों पक्ष से एक-एक नारियल
     2. हल्दी,
     3. सुपाड़ी
     4. अगरबत्ती
     5. फूल
     6. पिंवरा चांऊर
     7. मिठाई
     8. पूजा का सामान

मंगरोहन परघाई :
     1. दो मंगरोहन डूमर लकड़ी से बना हुआ एक पीढ़ी
     2. पिंवरा चांऊर
     3. मौली धागा
     4. फूल
     5. चौंक के लिए चांवल आटा
     6. दिया बाती
     7. बढ़ई के लिए चांऊर दार
     8. पूरा पूजा का सामान हुम सहित

लगन पुजहा बिदाई :
     1. साड़ी, पेटीकोट, ब्लाउज दुल्हन के लिए
     2. 5, 7 या 9 प्रकार का गहना चढ़ाव के लिए
     3. श्रृंगार का सामान
     4. चप्पल
     5. लड़की के लिए मौर (भांवर के लिए)
     6. आठ तेल चघ्घी मौर छिनवाला, बीजना
     7. एक साड़ी दादी के लिए
     8. एक साड़ी नानी के लिए
     9. सात सिंघोलिया छोटा (भांवर के लिए)
     10. बड़ा सिंघोलिया सिंदूर भरा हुआ
     11. सात अन्जरी चांवल और सात नारियल ढेड़हीन के लिए
     12. दो अन्जरी चांवल और दो नारियल पण्डित के लिए
     13. एक अन्जरी चांवल और एक नारियल नानी के लिए
     14. एक अन्जरी चांवल और एक नारियल नाऊ ठाकुर के लिए
     15. एक टोकरी चांवल पूरा भरा सिग का ढेड़हीन के लिए
     16. पूरे श्रृंगार का सामान ढेड़हीन के लिए
     17. एक पाव हल्दी डिब्बे में
     18. एक पाव शुद्ध घी डिब्बे में
     19. एक पाव सिक्सा या तिल
     20. ग्यारह फल अन्जरी के लिए
     21. एक टोकरी लड्डू व मिठाई
     22. 360 नग सुपारी

तेलमाटी एवं तेल :
     1. एक सब्बल
     2. सवा गज सफेद कपड़ा
     3. दो सिल लोढ़ा (सिल पौढ़ना के लिए)
     4. दो ढोलक
     5. एक पाव भीगा उड़द दाल
     6. एक किलो कच्ची हल्दी
     7. माहुर, कटारी
     8. दस तेल चघ्घी मौर
     9. एक नारियल गौरी गणेश के लिए
     10. एक नारियल हथवा
     11. चार करसा
     12. दो नांदी
     13. पुजा का पुरा सामान
     14. एक पाव कच्चा तिल का तेल हल्दी में डालने के लिए
     15. आठ बांस (मड़वा व दरवाजे के मड़वा के लिए)
     16. दो पूरा कांसी
     17. सात टुकनी
     18. चौक पुरने के लिए चांवल आटा
     19. दादी के लिए साड़ी

दौतेला :
     1. दो पर्रा नया (बीच में थाली में पूजा का सामान रखकर)
     2. एक साड़ी नाऊन ठाकुराईन के लिए
     3. ढेड़हीन के लिए साड़ी (जितनी बुआ और बहनें हैं)
     4. पिसी गीली हल्दी शीतला माता के लिए
     5. घर में बनी हुई मिठाई
     6. चांऊर दार बैइगा के लिए
     7. देवी देवता के लिए चढ़ौतरी

मायन :
     1. माय रोटी नया टोकरी में गेंहूं और गुड़ की मीठी सोंहारी
     2. एक साड़ी मायन उपसहीन के लिए (चाची - भाभी)
     3. पतरी
     4. पिंवरा चांऊर
     5. फूल
     6. मौली धागा
     7. चौक पुरने के लिए चांवल आटा
     8. नारियल एवं पूजा का पूरा सामान

चिकट :
     1. माता-पिता के लिए लड़की के मामा के यहाँ से साड़ी, पेंट शर्ट या धोती
     2. माता के लिए श्रृंगार का पूरा सामान मायके से
     3. चांऊर दार पहाटनिन के लिए मायके से
     4. दही चांऊर टिकने के लिए
     5. चिकट वालों के लिए शरबत

नहडोरी :
     1. साड़ी मेहमान महिलाओं के लिए
     2. धोती पुरुषों के लिए
     3. गरम पानी
     4. हरदाही के लिए गीली हल्दी

बरतिया बिदा के लिए (लड़के वालों के लिए):
     1. दो नया पर्रा में सेके हुए चांउर के आटे और गुड़ से बना 2 बड़ा-बड़ा गौरी गणेश, सात लड्डू
     2. आटे की लोई व कुंवारी सूत पाणिग्रहण के लिए
     3. दही, दूध, शहद, गंगाजल
     4. उड़द दाल
     5. पूजा का पूरा सामान, मौली धागा, सुपारी, हल्दी सहित
     6. बंगला पान
     7. हुम के लिए नया कटोरी
     8. हवन सामग्री व आम की लकड़ी
     9. एक धोती पण्डित के लिए
     10. एक मौली धागा
     11. लाई लगभग एक किलो
     12. पीला कपड़ा गठबंधन के लिए
     13. कपड़ा सारा जांवर के लिए
     14. एक नारियल और एक धोती समधी के लिए
     15. मुडढक्की साड़ी
     16. ढेड़हीन नेंग के लिए रुपया
     17. पण्डित की दक्षिणा के लिए रुपया
     18. पहाटिया, धोबी, नाऊ ठाकुर के लिए नेंग के रुपय
     19. सुपा सजा हुआ, मौर सौंपने के लिए
     20. लड़के के शादी का कपड़ा, मौर, नया जूता, टिका, मेकप का सामान
     21. कौर खिलाने के लिए लड्डू व बालूशाही

डोला परछन :
     1. ग्राम देवी देवता के लिए नारियल
     2. पूजा का पूरा सामान
     3. डोला परछन के लिए धान
     4. एक चादर
     5. सात गेंहूं के आटे की लोई
     6. बिछावन के लिए नया साड़ी या धोती (नवईन के लिए)
     7. माय चांऊर नापने के लिए 2 छोटी टोकरी

कंकन मौर :
     1. पूजा का पूरा सामान
     2. चूड़ी रंग
     3. खेलने के लिए कौड़ी
     4. एक सिक्का
     5. माला
     6. टिकने के लिए पीला चांऊर

डाहर छेकउनी : ढेड़हीन को देने के लिए नेग

भांवर :
     1. सिल
     2. लाई एक किलो
     3. गठबंधन का कपड़ा
     4. फूल हार, वर माला
     5. कच्चा दूध
     6. पूजा का पूरा सामान
     7. सिंदूर
     8. सारा जांवर के लिए कपड़ा
     9. गवन के बछवा
     10. चूड़ी रंग (लोचन पानी)
     11. रंगोली

बारात बिदाई :
     1. धोती बुजुर्गों के लिए (दादा, चाचा, पिता के लिए)
     2. कपड़ा दुल्हे के लिए
     3. लड़की को कपड़ा श्रृंगार का सामान आदि
     4. शरबत (भाई द्वारा पिलाने के लिए)
     5. सजा हुआ सुपा, चांवल के लिए आटे का दिया
     6. दो मुट्ठी सफ़ेद चांउर
     7. भरे गागर में डालने के लिए सिक्का
     8. कौर खिलाने के लिए लड्डू, बालूशाही


संकलन - श्रीमती फुटेनिया चन्द्राकर, सिरसाकला
 
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